६.२१ – सुखमात्यन्तिकं यत् तत्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक २० श्लोक सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् |वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वत: || पद पदार्थ अतीन्द्रियं – ज्ञानेन्द्रियों की पकड़ से परेबुद्धि ग्राह्यं – केवल आत्म ज्ञान से समझा जा सकता हैयत् तत् – प्रसिद्धआत्यन्तिकं सुखं – आत्मानुभूति की पवित्र आनंद ( … Read more

६.२० – यत्रोपरमते चित्तम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक १९ श्लोक यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया |यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति || पद पदार्थ योग सेवया – योग अभ्यास के कारण ( स्वयं का दर्शन )निरुद्धं – नियंत्रित ( बाहरी पहलुओं पर जाने से)चित्तं – मनयत्र – योग में ( स्वयं … Read more

६.१९ – यथा दीपो निवातस्थो

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक १८ श्लोक यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता |योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मन: || पद पदार्थ यथा चित्तस्य – ऐसा मन जो संयमित होयोगं युञ्जत: – जो आत्मा के संबंधित विषयों में योग अभ्यास में संलग्न हैयोगिन: – योगी केआत्मन: – … Read more

६.१८ – यदा विनियतं चित्तम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक १७ श्लोक यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते |नि:स्पृह: सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा || पद पदार्थ यदा – जबचित्तं – मनआत्मनि एव – विशेष रूप से आत्मा मेंविनियतं – संलग्न हैअवतिष्ठते – पूरी तरह से स्थिरतदा – उस समयसर्व कामेभ्य: – सभी सांसारिक … Read more

६.१७ – युक्ताहारविहारस्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक १६ श्लोक युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु |युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा || पद पदार्थ युक्ताहारविहारस्य – पर्याप्त मात्रा में भोजन और पर्याप्त शारीरिक गतिविधियाँ करनाकर्मसु – उसके कर्मों मेंयुक्त चेष्टस्य – पर्याप्त व्यवस्ताएँ होनायुक्त स्वप्न अवबोधस्य – पर्याप्त नींद और जागनादु:खहा – … Read more

६.१६ – नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक १५ श्लोक नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नत: |न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन || पद पदार्थ अर्जुन – हे अर्जुन !अत्यश्नत: तु – जो बहुत अधिक खाता हैयोग: – योग अभ्यासन अस्ति – उत्पन्न नहीं होताएकान्तं – बहुतअनश्नत: च – जो … Read more

६.१५ – युञ्जन्नेवं सदात्मानम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक १४ श्लोक युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानस: |शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति || पद पदार्थ योगी – योग अभ्यासीएवं – इस प्रकारआत्मानं – मन कोसदा – हमेशायुञ्जन् – ध्यान केंद्रित (मुझपर)नियतमानस: – ( फलस्वरूप) अनुशासित मन के साथमत् संस्थां – मुझमें रहकरनिर्वाण परमां … Read more

६.१४ – प्रशान्तात्मा विगतभी:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक १३ श्लोक प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित: |मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर: || पद पदार्थ प्रशान्तात्मा – शांत मन के साथविगतभी: – निर्भय होकरब्रह्मचारि व्रते स्थित: – ब्रह्मचर्य का पालन करतेमन: संयम्य – मन को नियंत्रित करकेमच्चित्त: – मुझपर मनन करते … Read more

६.१३ – समं कायशिरोग्रीवम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक १२ श्लोक समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर: |सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् || पद पदार्थ काय शिरो ग्रीवं समं – शरीर, सिर और गर्दन को सीधा रखकेअचलं – बिना कोई संचलन केस्थिर: – अटलधारयन् – स्थापित करदिशश्च अनवलोकयन् – किसी भी दिशा … Read more

६.१२ – तत्रैकाग्रं मन: कृत्वा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ६ << अध्याय ६ श्लोक ११ श्लोक तत्रैकाग्रं मन: कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय: |उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये || पद पदार्थ तत्र आसने – उस बैठक परउपविश्य – बैठकरमन: – मन कोएकाग्रं कृत्वा – एकल-केंद्रित रखकरयत चित्तेन्द्रिय क्रिय: – मन और इन्द्रियों के कर्मों पर नियंत्रण पाकरआत्म विशुद्धये – सांसारिक … Read more