श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्लोक
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्।।
पद पदार्थ
अनिर्देश्यं – अनिर्वचनीय है (क्योंकि वह शरीर से भिन्न है, तथा जिसे देवता, मनुष्य आदि नहीं कहा जा सकता)
अव्यक्तं – अविवेचनीय है (क्योंकि वह नेत्रों आदि इन्द्रियों से नहीं देखा जा सकता)
सर्वत्रगं – सभी शरीरों में विद्यमान रहते हुए भी
अचिन्त्यं च – अकल्पनीय है
कूटस्थं – सभी शरीरों में समान है
अचलं – अपने वास्तविक स्वरूप से कभी विचलित नहीं होता
ध्रुवम् – शाश्वत
अक्षरं (तं) – उस जीवात्मा
सरल अनुवाद
[परन्तु जो लोग] उस जीवात्मा के प्रति समर्पित हैं, जो अनिर्वचनीय है (क्योंकि वह शरीर से भिन्न है, तथा जिसे देवता, मनुष्य आदि नहीं कहा जा सकता), अविवेचनीय है (क्योंकि वह नेत्रों आदि इन्द्रियों से नहीं देखा जा सकता), सभी शरीरों में विद्यमान रहते हुए भी अकल्पनीय है, सभी शरीरों में समान है, अपने वास्तविक स्वरूप से कभी विचलित नहीं होता तथा शाश्वत है…
अडियेन् जानकी रामानुज दासी
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