गीतार्थ संग्रह – 1

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

पूर्ण श्रंखला

bhagavan

श्लोक 1 (गीता शास्त्र का उद्देश्य)

स्वधर्म ज्ञान वैराग्य साध्य भक्तयेका गोचर:|
नारायण परब्रह्म् गीता शास्त्रम् समीरित: ||

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शब्दार्थ (पुत्तूर कृष्णमाचार्य स्वामी द्वारा प्रदत्त तमिल अनुवाद पर आधारित)

  • स्वधर्म ज्ञान वैराग्य साध्य भक्तयेका गोचर: – वह जिन्हें भक्ति, जो सांसारिक तत्वों के प्रति वैराग्य से प्राप्त होती है, ज्ञान योग (ज्ञान का मार्ग) और कर्म योग (सुकर्मो का मार्ग), जो जीवात्मा के स्वरुप (वर्ण और आश्रम) के अनुरूप है, मात्र इन्ही तीनो उपायों के माध्यम से जाना जा सकता है
  • परब्रह्म – सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण
  • नारायण: – श्रीमन्नारायण भगवान
  • गीता शास्त्रम  – गीता नामक शास्त्र में
  • समीरित: – प्रकट/ उदघोषित

सुगम अनुवाद  (पुत्तूर कृष्णमाचार्य स्वामी द्वारा प्रदत्त तमिल अनुवाद पर आधारित)

श्रीमन्नारायण भगवान को केवल भक्ति, जो सांसारिक तत्वों के प्रति वैराग्य से प्राप्त होती है, ज्ञान योग और कर्म योग (सुकर्मों का मार्ग), जो जीवात्मा के स्वरुप (वर्ण और आश्रम) के अनुरूप है, मात्र इन्ही तीनो उपायों के माध्यम से जाना जा सकता है और वे ही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। गीता नामक शास्त्र में ऐसे दिव्य भगवान को प्रकट किया गया है।

– अदियेन भगवती रामानुजदासी

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