गीतार्थ संग्रह – 7

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

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ज्ञानी की महानता

श्लोक 29

ज्ञानी तु परमैकांती तदायत्तात्म जीवन: |
तत्सम्श्लेषवियोगैकसुखदुःखकस्तदेगधि: ||

Nammazhwarश्री शठकोप स्वामीजी – ज्ञानियों में श्रेष्ठ

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शब्दार्थ (पुत्तुर कृष्णमाचार्य स्वामी के तमिल अनुवाद पर आधारित)

परमैकांती ज्ञानी तु – ज्ञानी, जो पुर्णतः भगवान को समर्पित है
तदा यत्तात्म जीवन: – ऐसा जीवन, जो पुर्णतः भगवान के आश्रित/ समर्पित है
तत् सम्श्लेष वियोगैक सुखदुःख: – भगवान से मिलन आनंदपूर्ण और भगवान से बिछोह अति कष्टदायी प्रतीत होना
तदेकधि: – वह जिनका ज्ञान पुर्णतः मात्र भगवान ही में स्थित है

सुगम अनुवाद (पुत्तुर कृष्णमाचार्य स्वामी के तमिल अनुवाद पर आधारित)

ज्ञानी, वह है जो पुर्णतः भगवान को समर्पित है, जिनका जीवन पुर्णतः भगवान के आश्रित/ समर्पित है, जिनके लिए भगवान से मिलन आनंदपूर्ण और भगवान से बिछोह अति कष्टदायी है और वह जिनका ज्ञान पुर्णतः मात्र भगवान ही में स्थित है।

श्लोक 30

भगवदध्यान योगोक्ति वंदनस्तुतिकिर्तनै: |
लब्धात्मा तदगतप्राण मनोबुद्धिन्द्रिय क्रिय: ||

nammalwar-art-2श्री शठकोप स्वामीजी तिरुवाय्मोळि 6.7.1 में बताते है- “उण्णुम् सोरु परुगु नीर तिन्नुम वेट्रीलैयुम एल्लाम कण्णन “ (अन्न, जल और सूखे मेवे – जीवन आधार, पोषण और भोग – सभी श्रीकृष्ण ही है)

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शब्दार्थ (पुत्तुर कृष्णमाचार्य स्वामी के तमिल अनुवाद पर आधारित)

भगवत ध्यान योग उक्ति वंदन स्तुति कीर्तनै: – भगवान के ध्यान, उन्हें देखना, उनके विषय में कहना, उनकी आराधना, उनका मंगलाशासन, उनके गुणगान के द्वारा
लब्धात्मा – वह जो स्वयं का पोषण करता है
तत् गत प्राण मनो बुद्धि ईन्द्रिय क्रिय: – वह जिसका जीवन, मानस, बुद्धि, विवेक सिर्फ भगवान ही में संलग्न है

सुगम अनुवाद (पुत्तुर कृष्णमाचार्य स्वामी के तमिल अनुवाद पर आधारित)

वह जो भगवान के ध्यान, उन्हें देखना, उनके विषय में कहना, उनकी आराधना, उनके मंगलाशासन, उनके गुणगान के द्वारा स्वयं का पोषण करता है, उसके जीवन, मानस, बुद्धि, विवेक सिर्फ भगवान ही में संलग्न है।

श्लोक 31

निज कर्मादि भक्तयन्तं कुर्यात प्रित्यैव कारित: |
उपायताम् परित्यज्य न्यस्येधदेवे तु तामभी: ||

emperumanar-1श्री रामानुज स्वामीजी –  ज्ञानियों में श्रेष्ठ

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शब्दार्थ (पुत्तुर कृष्णमाचार्य स्वामी के तमिल अनुवाद पर आधारित)

निज कर्मादि – अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार कर्म योग से प्रारंभ करते हुए
भक्त अन्तं – भक्ति योग पर्यंत सभी साधन
उपायताम् परित्यज्य – उनमें साधन भाव को त्याग करके (भगवान को प्राप्त करने हेतु)
प्रित्य एव कारित: – श्रद्धा /भक्ति से अभिभूत (भगवान के लिए उपयुक्त है जो सभी जीवों के स्वाभाविक स्वामी है)
कुर्यात – निष्पादन करेंगे (ज्ञानी जो परमैकांति है – वे पुर्णतः भगवान में स्थित है)
अभी: – बिना भय के
ताम – वह उपायत्व (साधनरूप से)
देवे तु – भगवान में ही
न्यस्येत – ध्यान करना चाहिए

सुगम अनुवाद (पुत्तुर कृष्णमाचार्य स्वामी के तमिल अनुवाद पर आधारित)

ज्ञानी जो परमैकांतिक (पुर्णतः भगवान में स्थित है), श्रद्धा /भक्ति से अभिभूत है (भगवान के लिए उपयुक्त है जो सभी जीवों के स्वाभाविक स्वामी है), वे अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार कर्म योग से प्रारंभ करते हुए भक्ति योग पर्यंत सभी साधनों में साधन भाव का त्याग करके उनका निष्पादन करेंगे (भगवान को प्राप्त करने हेतु)। उस उपायत्व (साधनरूप) से बिना भय के भगवान में ही ध्यान करना चाहिए।

– अदियेन भगवती रामानुजदासी

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