गीतार्थ संग्रह – 8

श्री:
श्रीमते शठकोपाये नम:
श्रीमते रामानुजाये नम:
श्रीमदवरवरमुनये नम:

पूर्ण श्रंखला

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सारांश

श्लोक 32

एकांतत्यंतत दास्यैकरथीस् तत्पदमाप्नुयात् |
तत्प्रधानमिदम् शास्त्रमिति गीतार्थसंग्रह: ||

paramapadhanathanपरमपद – श्रीमन्नारायण भगवान का दिव्य धाम, जो परम सौभाग्य है

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शब्दार्थ (पुत्तुर कृष्णमाचार्य स्वामी के तमिल अनुवाद पर आधारित)

एकांत अत्यंत दास्यैकरथी: – परमैकांति जो सदा मात्र ऐसे सेवा कैंकर्य की चाहना करता है जो पुर्णतः भगवान के मुखोल्लास पर केन्द्रित हो
तत् पदम् भगवान के चरण कमल (भगवान की सेवा कैंकर्य के लिए)
आप्नुयात – पहुंचेगा
ईदम् शास्त्रं – यह गीता शास्त्र
तत् प्रधानं – जीवात्मा को परमैकांति में परिवर्तित करना ही मुख्य उद्देश्य है
इति – इस प्रकार
गीतार्थ संग्रह: – भगवत गीता के अर्थों का संक्षिप्त रूप से विवेचन करने वाली यह “गीतार्थ संग्रह” यहाँ संपन्न हुई

सुगम अनुवाद (पुत्तुर कृष्णमाचार्य स्वामी के तमिल अनुवाद पर आधारित)

परमैकांति जो सदा मात्र ऐसे सेवा कैंकर्य की चाहना करता है जो पुर्णतः भगवान के मुखोल्लास पर केन्द्रित हो, वह भगवान के चरण कमल (भगवान की सेवा कैंकर्य के लिए) में आश्रय प्राप्त करेगा। इस गीता शास्त्र का मुख्य उद्देश्य जीवात्मा को परमैकांति में परिवर्तित करना ही है। इस प्रकार, भगवत गीता के अर्थों का संक्षिप्त रूप से विवेचन करने वाली यह “गीतार्थ संग्रह” यहाँ संपन्न हुई।

आलवन्दार द्वारा रचित गीतार्थ संग्रह के हिंदी अनुवाद का इतिश्री।

श्रीशठकोप स्वामीजी के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीयामुनाचार्य स्वामीजी के चरणकमलों में शरण लेता हूँ
श्रीरामानुज स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ
श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के चरण कमलों में शरण लेता हूँ

– अदियेन भगवती रामानुजदासी

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