५.१४ – न कर्तृत्वं न कर्माणि

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक १३ श्लोक न कर्तृत्वं  न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।न  कर्मफलसंयोगं  स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ पद पदार्थ प्रभु: – जीवात्मा जो वास्तविक स्वरूप में कर्म से बंधा नहीं हैलोकस्य – लोगों के विविध संग्रह के लिए [इस दुनिया में]कर्तृत्वं न सृजति … Read more

५.१३ – सर्वकर्माणि मनसा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक १२ श्लोक सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते सुखं  वशी ।नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन् न कारयन् ॥ पद पदार्थ देही – अवतरितवशी – आत्मा जो (स्वाभाविक रूप से) अपने नियंत्रण में हैनव द्वारे – शरीर के नौ द्वार वाले शहर मेंसर्व कर्माणि … Read more

५.१२ – युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक ११ श्लोक युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ पद पदार्थ युक्तः – जो अन्य मामलों में इच्छा के बिना आत्मा पर ध्यान केंद्रित हैकर्म फलं – कर्मों का परिणाम जैसे स्वर्गलोक पहुँचना आदित्यक्त्वा – त्याग … Read more

श्री भगवद्गीता का सारतत्त्व – अध्याय २ (सांख्य योग)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री भगवद्गीता का सारतत्त्व << अध्याय १ गीतार्थ संग्रह के छठे श्लोक में, आळवन्दार दूसरे अध्याय का सारांश समझाते हुए कहते हैं, “ “शाश्वत आत्मा, वैराग्य के साथ धार्मिक कर्तव्य,  स्थितप्रज्ञ का अवस्था  (निर्णय और ज्ञान में दृढ़) की लक्ष्य , स्वयं और कर्म योग के … Read more

५.११ – कायेन मनसा बुद्ध्या

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक १० श्लोक कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ पद पदार्थ योगिन: – कर्म योगीसङ्गं – स्वर्ग आदि के प्रति लगावत्यक्त्वा – त्याग करकेआत्म शुद्धये – आत्मा से प्राचीन कर्मों (पुण्य / पाप ) से छुटकारा पाने और … Read more

५.१० – ब्रह्मण्याधाय कर्माणि

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक ८ और ९ श्लोक ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं  त्यक्त्वा करोति यः।लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ पद पदार्थ यः- जो एकब्रह्मणि – इन्द्रियों जो महान प्रकृति  का प्रभाव हैंकर्माणि – देखने जैसे कर्म (जो स्वयं करता है )आधाय – (जैसा कि … Read more

५.८ और ५.९ – नैव किञ्चित् करोमीति

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक ७ श्लोक नैव किञ्चित् करोमीति  युक्तो मन्येत तत्त्ववित्  ।पश्यन् श्रुण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन्  गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥ प्रलपन् विसृजन् गृह्णन्नुन्मिशन् निमिशन्नपि ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ पद पदार्थ तत्त्ववित् – जो आत्मा को वास्तव में  जानता हैयुक्त: – कर्मयोगीपश्यन्-आँखों से … Read more

५.७ – योगयुक्तो विशुध्दात्मा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक ६ श्लोक योगयुक्तो विशुध्दात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।सर्वभूतात्म भूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ पद पदार्थ योग युक्त: – कर्म योग का अभ्यासी विशुद्धात्मा – (उसके परिणाम स्वरूप) शुद्ध हृदय से विजितात्मा – (उसके परिणाम स्वरूप) नियंत्रित मन से जितेन्द्रिय: – (उसके परिणाम स्वरूप) सभी इंद्रियों … Read more

५.६ – सन्यासस् तु महाबाहो

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक ५ श्लोक सन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ पद पदार्थ महाबाहो –हे शक्तिशाली भुजाओं वाला !सन्यास: तु  – ज्ञान योगअयोगतः – पहले कर्म योग किए बिनाआप्तुं  दुःखं  – प्राप्त करना कठिन;योग युक्त: – कर्म योग का अभ्यासीमुनि: – आत्मा … Read more

५.५ – यत् साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक ४ श्लोक यत्साङ्ख्यैः  प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि  गम्यते ।एकं  साङ्ख्यं  च योगं  च यः पश्यति स पश्यति ॥ पद पदार्थ यत् स्थानं – आत्मबोध का वह परिणामसाङ्ख्यैः – ज्ञान योग के अनुयायियों द्वाराप्राप्यते – प्राप्त होता हैतत्  – वही परिणामयोगै: अपि … Read more