६.१ – अनाश्रितः कर्मफलं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय ६

<< अध्याय ५ श्लोक २९

श्लोक

श्री भगवानुवाच –
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥

पद पदार्थ

श्री भगवानुवाच – भगवान श्री कृष्ण कहते हैं
कर्म फलं – कर्म के परिणाम जैसे स्वर्ग इत्यादि
अनाश्रितः – पकडे बिना
कार्यं ( इति ) कर्म यः करोति – वह, जो केवल कर्तव्य निभाने की उद्देश्य में कर्म योग करता है ( बिना कोई अपेक्षा के )
स: संन्यासी च – वह ज्ञान योग निष्ट ( अभ्यासी ) रहता है
(स:) योगी च – वह कर्म योग निष्ट ( अभ्यासी ) भी रहता है
(स:) न निरग्नि: – न वह यज्ञ जैसे अग्नि का आह्वान करते कर्मों से परे रहता है
(स:) न च अक्रिय: – न वह एकमात्र ज्ञान निष्ट है ( वह जो पर्याप्त कर्म के बिना , विशेष रूप से ज्ञान की खोज पर ध्यान केंद्रित रहता है )

सरल अनुवाद

वह जो केवल कर्तव्य निभाने की उद्देश्य में कर्म योग करता है ( बिना कोई अपेक्षा के ) , कर्म के परिणाम जैसे स्वर्ग इत्यादि को बिना पकडे , ज्ञान योग निष्ट ( अभ्यासी ) रहता है ; वह कर्म योग निष्ट ( अभ्यासी ) भी रहता है ; न वह यज्ञ जैसे अग्नि का आह्वान करते कर्मों से परे रहता है न वह एकमात्र ज्ञान निष्ट रहता है (वह जो पर्याप्त कर्म के बिना , विशेष रूप से ज्ञान की खोज पर ध्यान केंद्रित रहता है ) |

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

>> अध्याय ६ श्लोक २

आधार – http://githa.koyil.org/index.php/6-1/

संगृहीत – http://githa.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org