१८.८ – दुःखम् इत्येव यत् कर्म

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय १८

<< अध्याय १८ श्लोक ७

श्लोक

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात् त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्।।

पद पदार्थ

काय क्लेश भयात् – शरीर को होने वाले कष्ट के भय से
दुःखम् इति एव – दुःखदायी होने के कारण
कर्म – नित्य कर्म (दैनिक अनुष्ठान), नैमित्तिक कर्म (आवधिक अनुष्ठान) आदि कर्मों को
यत् त्यजेत् – यदि त्याग देता है
स: – वह
राजसं त्यागं कृत्वा – रजो गुण (वासना) के प्रभाव से त्यागने के कारण
त्याग फलं – वह ज्ञान जो सात्विक त्याग (सत्व गुण से कर्म का त्याग) का परिणाम है
न एव लभेत् – कभी प्राप्त नहीं होगा

सरल अनुवाद

यदि कोई नित्य कर्म (दैनिक अनुष्ठान), नैमित्तिक कर्म (आवधिक अनुष्ठान) आदि कर्मों को शरीर को होने वाले कष्ट के भय से तथा उन कर्मों के दुःखदायी होने के कारण, रजो गुण (वासना) के प्रभाव से त्याग देता है, तो उसे वह ज्ञान, जो सात्विक त्याग (सत्व गुण से कर्म का त्याग) का परिणाम है, कभी प्राप्त नहीं होगा।

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

>> अध्याय १८ श्लोक ९

आधार – http://githa.koyil.org/index.php/18-8/

संगृहीत – http://githa.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org