२.३६ – अवाच्य वादांश्च बहून्‌

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय २

<<अध्याय २ श्लोक ३५

श्लोक

अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌ ॥

पद पदार्थ

तव अहिताः – तुम्हारे शत्रु जैसे दुर्योधन इत्यादि
तव – तुम्हारे
सामर्थ्यं – योग्यता
निन्दन्त: – अपमानजनक शब्दों से
बहून्‌ अवाच्यवादांश्च – एवं अनिर्वचनीय शब्दों से
वदिष्यन्ति – कहेंगे
तत: – उन शब्दों को सुनने से
दुःखतरं – दुखदायी
किं नु – और कुछ है ?

सरल अनुवाद

तुम्हारे शत्रु ,जैसे दुर्योधन इत्यादि अपमानजनक एवं अनिर्वचनीय शब्दों से तुम्हारे योग्यता को नीचा दिखने की कोशिश करेंगे | उन शब्दों को सुनने से दुखदायी और कुछ है ?

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

>>अध्याय २ श्लोक ३७

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