३.१९ – तस्मादसक्तः सततम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय ३

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श्लोक

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

पद पदार्थ

तस्मात् –  इस प्रकार, इन सभी कारणों से (जो पहले बताया  गया है)
असक्तः- वैराग्य सहित
सततं  – बिना रुके (जब तक आत्मदृष्टि न मिले )
कार्यं (इत्येव) – जो अनिवार्य है
कर्म – कर्म योग
समाचर –  तुम करते रहो ;
असक्तः- वैराग्य सहित
कर्म – कर्म योग
आचरण – जो करता है
पुरुष: – पुरुष
परं  – आत्मा (जो प्रकृति से भी ऊंचा है)
आप्नोति  – प्राप्त करता है (एहसास करता है)

सरल अनुवाद

इस प्रकार, इन सभी कारणों से (जो पहले समझाया गया है), तुम वैराग्य सहित कर्म योग करते रहो , जो (जब तक आत्मदृष्टि न मिले ) अनिवार्य है और बिना किसी रुकावट के करना चाहिए  । जो मनुष्य वैराग्य के साथ कर्मयोग करता है, वह आत्मा (जो प्रकृति से भी उच्च है) प्राप्त करता है (एहसास करता है)।

अडियेन् कण्णम्माळ् रामनुजदासी

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