३.२४ – उत्सीदेयुरिमे लोका

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय ३

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श्लोक

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌ ।
सङ्करस्य
च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥

पद पदार्थ

अहम् – मैं
कर्म – कर्तव्य ( मेरे कुल संबंधित कर्म )
न कुर्यां चेत् – अगर नहीं करूंगा
इमे लोका: – इस जगत के निवासी ( जो मेरे अनुशासन का पालन करते हैं )
उत्सीदेयु: – का विनाश हो जाएगा
सङ्करस्य – मिश्रण ( सक्षम अनुचरों के कुटुम्ब में )
कर्ता च स्याम – स्वयं उसका कारण बन जाऊँगा

इस प्रकार ,
इमाः प्रजाः – इन सारे लोगों के
उपहन्याम् – पतन का कारण बन जाऊँगा ( भविष्य में भी )

सरल अनुवाद

अगर मैं अपना कर्तव्य ( मेरे कुल संबंधित कर्म ) नहीं करूंगा, इस जगत के निवासी ( जो मेरे अनुशासन का पालन करते हैं ) का विनाश हो जाएगा ; मैं स्वयं उनके मिश्रण ( सक्षम अनुचरों के कुटुम्ब में अपवित्रता) का कारण बन जाऊँगा ; मैं स्वयं इन सारे लोगों के पतन का कारण बन जाऊँगा ( भविष्य में भी) |

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

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