३.२५ – सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय ३

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श्लोक

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश् चिकीषुर्लोकसङ्ग्रहम्‌ ॥

पद पदार्थ

भारत – हे भरतवंशी !
कर्मणि सक्ता: – जो निस्संदेह कर्म से जुड़े हुए हो
अविद्वांस – जो आत्मा के यतार्थ रूप से परिचित न हो
यथा कुर्वन्ति – जिस प्रकार वो कर्म योग में मग्न होंगे ( आत्मानुभूति के लिए )
तथा – उसी प्रकार
असक्त: – कर्म से पृथक
विद्वान् – जो आत्मा के प्रति पूरी तरह से सचेत हो
लोकसंग्रहम्‌ चिकीर्षुः – सर्वलोक कल्याण की अभिलाषा में
कुर्यात् – कर्म योग में मग्न होंगे

सरल अनुवाद

हे भरतवंशी ! जिस प्रकार निस्संदेह कर्म से जुड़े हुए हो और आत्मा के यतार्थ रूप से अपरिचित लोग कर्म योग में मग्न होंगे ( आत्मानुभूति के लिए ) ; उसी प्रकार, जो आत्मा के प्रति पूरी तरह से सचेत हो , कर्म योग में सर्वलोक कल्याण की अभिलाषा में मग्न होंगे ; लेकिन वो कर्म से पृथक रहेंगे |

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

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