३.५ – न हि कश्चित् क्षणम् अपि

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय ३

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श्लोक

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥

पद पदार्थ

हि – क्योंकि
कश्चित्  – कोई भी
जातु – सदैव
क्षणं अपि – एक क्षण के लिए भी
अकर्मकृत – बिना कर्म किये
न तिष्ठति  – नहीं रह सकता;
सर्व:- हर कोई (यहां तक ​​कि वे भी जिन्होंने कर्महीन रहने की प्रतिज्ञा ली है)
प्रकृतिजै:- जो पदार्थ के संयोग से बढ़ती है
गुणै : – सत्व, रजस और तमस जैसे गुण
कर्म – अपने संबंधित कार्यों के विषय में
अवशः- अनजाने में
कार्यते हि – क्या वे प्रेरित नहीं हुए ?

सरल अनुवाद

क्योंकि कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता, तो क्या हर कोई (यहाँ तक कि वे भी जिन्होंने कर्महीन रहने की प्रतिज्ञा ली है) सत्व, रजस और तमस जैसे गुणों पर आधारित कर्मों में , जो विषयों के संबंध के कारण बढ़ते हैं, प्रेरित नहीं हैं? (इससे, यह अर्थ निकलता  कि, जब तक कोई कर्म योग में ग्रस्त नहीं होता, रजस और तमस को कम नहीं करता और सत्व गुण को नहीं बढ़ाता, ज्ञान योग पूरा नहीं होगा।)

अडियेन् कण्णम्माळ् रामनुजदासी

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