१७.२६ – सद्भावे साधुभावे च

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक २५ श्लोक सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।। पद पदार्थ पार्थ – हे कुन्तीपुत्र!सत् इति एतत् – सत् शब्दसद्भावे – “एक वस्तु जो है” का संकेत देनासाधुभावे च – और “एक अच्छी वस्तु ” का संकेत देनाप्रयुज्यते … Read more

१७.२५ – तदिति अनभिसन्धाय

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक २४ श्लोक तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:।। पद पदार्थ मोक्षकाङ्क्षिभि: – मोक्ष की इच्छा रखने वालों [ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य] के द्वाराविविधाः – कई प्रकारयज्ञ तपः क्रियाः – यज्ञ और तपस्यादान क्रिया: च – और दानतत् इति – “तत्” (जो … Read more

१७.२४ – तस्मादोम् इत्युदाहृत्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक २३ श्लोक तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।। पद पदार्थ तस्मात् – चूँकि इन तीन शब्दों सहित वैधिक कर्म (इस प्रकार, मेरे द्वारा) निर्मित किये गये हैंब्रह्मवादिनाम् – उनके [ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों] द्वारा किये जाते हैं जो वेदों का पाठ … Read more

१७.२३ – ॐ तत् सदिति निर्देशो

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक २२ श्लोक ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।। पद पदार्थ ॐ तत् सत् इति – “ॐ तत् सत्”त्रिविधः निर्देश: – तीन शब्दब्राह्मण: स्मृतः – वैधिक कर्म [अनुष्ठान] से युक्त कहे गए हैंतेन – इन तीन शब्दों से … Read more

१७.२२ – अदेशकाले यद्दानम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक २१ श्लोक अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।। पद पदार्थ अदेशकाले – गलत स्थान और समय परअपात्रेभ्य: च – गलत पात्र कोअसत्कृतं – पात्र का अनादर करते हुएअवज्ञातं – पात्र का अपमान करते हुएयद्दानं दीयते – जो दान किया जाता हैतत् – … Read more

१७.२१ – यत् तु प्रत्युपकारार्थं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक २० श्लोक यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसमुदाहृतम्।। पद पदार्थ प्रत्युपकारार्थं – बदले में उपकार की आशा करते हुएफलम् उद्दिश्य वा पुनः – या पुरस्कार (परलोक में) की आशा करते हुएपरिक्लिष्टं – दुःखी मन सेयत्तु दीयते – … Read more

१७.२० – दातव्यम् इति यद्दानम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक १९ श्लोक दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।। पद पदार्थ अनुपकारिणे – जिससे बदले में कुछ मिलने की आशा न की जाएदातव्यम् इति – केवल दान देने के उद्देश्य से दान दिया जाता हैदेशे – उचित … Read more

१७.१९ – मूढग्राहेणात्मनो यत्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक १८ श्लोक मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।। पद पदार्थ मूढग्राहेण – मूर्ख व्यक्तियों की प्रबल इच्छा के कारणआत्मन: पीडया – स्वयं को कष्ट देनेपरस्य उत्सादनार्थं वा – दूसरों को कष्ट देनेयत् तपः क्रियते – जो तपस्या की जाती हैतत् … Read more

१७.१८ – सत्कार मान पूजार्थं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक १७ श्लोक सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।। पद पदार्थ सत्कार मान पूजार्थं – जो सम्मान, प्रशंसा और पूजा पाने के लिएदम्भेन च एव – तथा दिखावे के लिएयत् तप: क्रियते – तप किया जाता हैतत् – … Read more

१७.१७ – श्रद्धया परया तप्तं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १७ << अध्याय १७ श्लोक १६ श्लोक श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः।अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।। पद पदार्थ अफलाकाङ्क्षिभि: – जो कर्मफल से विरक्त हैंयुक्तैः – इस विचार से करते हैं कि यह परमात्मा की पूजा का ही एक अंग हैनरैः – उन पुरुषों द्वारापरया श्रद्धया … Read more