२.१७ – अविनाशि तु तद्विद्धि

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय २

<<अध्याय २ श्लोक १६

श्लोक

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌ ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥

पद पदार्थ

येन – वो आत्मा
इदं सर्वं – ये सारे अचित वस्तु
ततम्‌ – व्यापित है
तत् तु – वो आत्मा
अविनाशि – कभी नाश नहीं होगा
विद्धि – जानो
अव्ययस्य – अविनाशि
अस्य – यह आत्मा
कश्चित् – किसी वस्तु
विनाशं – नाश
कर्तुम – करना
न अर्हति – असंभव है

सरल अनुवाद

यह जान लो कि, आत्मा जो ये सारे अचित वस्तुओं में व्यापित है, वो अविनाशि है और किसी भी तरीके से उसका नाश होना असंभव है |

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

>> अध्याय २ श्लोक १८

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