६.५ – उद्धरेत् आत्मनात्मानं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय ६

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श्लोक

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

पद पदार्थ

आत्मना – मन ( जो सांसारिक सुखों से विरक्त हो ) के साथ
आत्मानं – स्वयं
उद्धरेता – उन्नति करें
[ आत्मना – मन जो सांसारिक सुखों से जुड़ा हो ] आत्मानं – स्वयं
न अवसादयेत् – स्वयं को नीचे धकेलना नहीं चाहिए
आत्मा एव – केवल मन ( जो सांसारिक सुखों से विरक्त हो )
आत्मन: – स्वयं के लिए
बन्धु: – संबंधी / मित्र
आत्मा एव – केवल मन (जो सांसारिक सुखों में संलग्न हो )
आत्मन: – स्वयं के लिए
रिपु – शत्रु

सरल अनुवाद

व्यक्ति को स्वयं को, उस मन से ऊपर उठाना चाहिए जो सांसारिक सुखों से विरक्त है ; सांसारिक सुखों से जुड़े मन से व्यक्ति को अपने आप को नीचे नहीं धकेलना चाहिए ; केवल मन ( जब सांसारिक सुखों से विरक्त हो ) ही किसी का संबंधी / मित्र है और शत्रु (जब सांसारिक सुखों में संलग्न हो ) भी वही है |

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

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