१.१८ – द्रुपदो द्रौपदेयाश्च

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय १ 

< < अध्याय १ श्लोक १७

श्लोक

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वतः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक् ॥

पद पदार्थ

पृथिवीपते – हे पृथिवी के स्वामी [राजा ध्रुतराष्ट्र]!
द्रुपदो – द्रुपद [पांचाल के राजा]
द्रौपदेया: च – और द्रौपदि के पुत्र
महाबाहु:- लंबे हाथ वाले
सौभद्र: – सुभद्रा के पुत्र [अभिमन्यु] 
सर्वत:- सभी दिशाओं में
पृथक् पृथक् – व्यक्तिगत रूप से
शङ्खान्  – उनके संबंधित शंख
दध्मुः – बजाये 

सरल अनुवाद

हे पृथिवी के स्वामी, राजा धृतराष्ट्र! (पांचाल के राजा) द्रुपद, द्रौपदि के पुत्र और सुभद्रा के पुत्र [अभिमन्यु] , जिनके लंबे (शक्तिशाली) हाथ हैं,  सभी ने सभी दिशाओं में अपने-अपने शंख बजाये।

>>अध्याय १ श्लोक १.१९

अडियेन् कण्णम्माळ् रामानुजदासि

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