१.१७ – काश्यश्च

श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय १

< < अध्याय १  श्लोक १६

श्लोक

काश्यश्च परमेष्वास : शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टध्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥

पद पदार्थ 

परमेष्वास: – महान धनुर्धर
काश्य: च – काशी के राजा
महारथ: – महान सारथी
शिखण्डी च – और शिखण्डी
धृष्टध्युम्न: – और धृष्टध्युम्न 
विराट: च  – और विराट के राजा
अपराजिता – अपराजय
सात्यकी: च – और सात्यकी

सरल अनुवाद

महान धनुर्धर काशी के राजा, और शिखण्डी, जो एक महान सारथी है, और धृष्टद्युम्न, और विराट के राजा, और अजय सात्यकी (अपने अपने शंख बजाये ।

>>अध्याय १ श्लोक १.१८

अडियेन् कण्णम्माळ् रामानुजदासि

आधार – http://githa.koyil.org/index.php/1-17/

संगृहीत- http://githa.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org