२.६१ – तानि सर्वाणि संयम्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय २

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श्लोक

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

पद पदार्थ

तानि सर्वाणी – वे सभी इंद्रियाँ (जो सांसारिक सुखों में आकर्षित होने के कारण दूर करना मुश्किल है)
संयम्य – सांसारिक सुखों से खींचकर 
मत्परः- मुझमें लग जाओ
युक्त:- आत्मसंतुष्ट होना
आसीत – उसे जीवित रहने दो
यस्य – जिसे 
इन्द्रियाणि – मन सहित इन्द्रियों 
वशे  – नियंत्रण में (मेरी कृपा से)
तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठा हि – क्या उसका ज्ञान दृढ़ नहीं है?

सरल अनुवाद

वह उन सभी इन्द्रियों को (जो सांसारिक सुखों में आकर्षित होने के कारण दूर करना मुश्किल है) सांसारिक सुखों से खींचकर, (उन्हें)  मुझमे समर्पित, आत्मसंतुष्ट होकर, जीवित रहे; जिसके मन सहित इन्द्रियाँ वश में हैं (मेरी कृपा से), क्या उसका ज्ञान दृढ़ नहीं है?

अडियेन् कण्णम्माळ् रामनुजदासी

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