४.१३.५ – न मां कर्माणि लिम्पन्ति

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय ४

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श्लोक

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा |

पद पदार्थ

कर्माणि – सृष्टि जैसे कार्य इत्यादि
माम् – मैं ( जो सर्वेश्वर हूँ )
न लिम्पन्ति – से बंधा नहीं हूँ
मे – मुझे ( जो अवाप्त समस्त काम (किसी भी वस्तु से इच्छारहित ) हूँ )
कर्म फले – सृष्टि जैसे कार्यों के फल इत्यादि
न स्पृहा – कोई अभिलाषा नहीं है

सरल अनुवाद

सृष्टि जैसे कार्य इत्यादि से मैं ( जो सर्वेश्वर हूँ ) बंधा नहीं हूँ | सृष्टि जैसे कार्यों के फल इत्यादि से मुझे कोई अभिलाषा नहीं है |

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

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