७.५ – अपरेयं इतस् त्वन्याम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय ७

<< अध्याय ७ श्लोक ४

श्लोक

अपरेयमितस्त्वन्यां  प्रकृतिं  विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां  महाबाहो ययेदं  धार्यते जगत् ॥

पद पदार्थ

महाबाहो – हे शक्तिशाली भुजाओं वाले!
इयं – यह भौतिक प्रकृति जो अचेतन है
अपरा – हीन है;
इत: – इससे
अन्यां तु – भिन्न
जीवभूतां – जिसे जीव कहा जाता है
पराम् – पहले बताई गई भौतिक प्रकृति से श्रेष्ठ
प्रकृतिं – [आध्यात्मिक] पदार्थ
मे विद्धि – मेरे रूप में जानो;
यया – जिस जीव द्वारा
इदं जगत – यह ब्रह्मांड
धार्यते – कायम है

सरल अनुवाद

हे शक्तिशाली भुजाओं वाले ! यह अचेतन भौतिक प्रकृति हीन है; जान लो कि वह [आध्यात्मिक] पदार्थ जिसे जीव कहा जाता है, जो भौतिक प्रकृति से भिन्न और श्रेष्ठ है, मेरा है; इस जीव (अर्थात् जीवात्माओं का संग्रह) के द्वारा ही यह ब्रह्मांड कायम है।

अडियेन् कण्णम्माळ् रामानुजदासी

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