११.३१ – आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ११ << अध्याय ११ श्लोक ३० श्लोक आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद।विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।। पद पदार्थ देववर – हे देवताओं में श्रेष्ठ !उग्र रूप भवान् – तुम जो अत्यंत उग्र रूप वाले होक: – तुम क्या करना चाहते … Read more