४.१७ – कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

अध्याय ४

<< अध्याय ४ श्लोक १६

श्लोक

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण: |
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ||

पद पदार्थ

हि – क्योंकि
कर्मण: अपि – कर्म की प्रकृति में
बोद्धव्यं – जानने योग्य पहलू कई हैं
विकर्मण: – विभिन्न प्रकार के कर्म में
बोद्धव्यं – जानने योग्य पहलू कई हैं
अकर्मण: च – ज्ञान योग ( जो कर्म योग का एक अंग है )
बोद्धव्यं – जानने योग्य पहलू कई हैं

( इसलिए )
कर्मण: गति: – जिसे समझना होगा
गहना – उसे समझना कठिन है

सरल अनुवाद

क्योंकि कर्म की प्रकृति में जानने योग्य पहलू कई हैं ; विभिन्न प्रकार के कर्म और ज्ञान योग ( जो कर्म योग का एक अंग है ) में जानने योग्य पहलू कई हैं, जिसे समझना होगा उसे समझना कठिन है |

अडियेन् जानकी रामानुज दासी

>> अध्याय ४ श्लोक १८

आधार – http://githa.koyil.org/index.php/4-17/

संगृहीत – http://githa.koyil.org

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org