३.२० – लोकसङ्ग्रहम् एवापि
श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक १९.५ श्लोक लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ पद पदार्थ लोक संग्रहम् एव – केवल [सामान्य सांसारिक] लोगों को प्रेरित करने के लिए [उनकी मदद करने के लिए]संपश्यन् अपि – इसे ध्यान में रखते हुएकर्तुम् अर्हसि – तुम्हारे लिए कर्म योग में संलग्न होना … Read more