३.१० – सहयज्ञै: प्रजाः सृष्ट्वा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक ९ श्लोक  सहयज्ञै : प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोSस्त्विष्टकामधुक् ॥ पद पदार्थ प्रजापति – परमात्मा जो सर्वेश्वर हैंपुरा  – सृष्टि के आरंभ मेंयज्ञै: सह – यज्ञ के साथ  ( उनके पूजा के संकल्प में )प्रजा:- जीवसृष्ट्वा – निर्मितउवाच … Read more

३.९ – यज्ञार्थात् कर्मणोSन्यत्र

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक ८ श्लोक यज्ञार्थात्कर्मणोSन्यत्र लोकोSयं कर्मबन्धनः ।तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ॥ पद पदार्थ यज्ञार्थ कर्मण: अन्यत्र – केवल तब जब यज्ञ के लिए किए गए कार्यों के अलावा अन्य कार्यों में संलग्न होअयं लोक:- यह संसारकर्म बंधन:- कर्म से बंधा जाता है(इस प्रकार)हे … Read more

३.८ – नियतम् कुरु कर्म त्वम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक ७ श्लोक नियतं  कुरु कर्म त्वम् कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्येदकर्मणः ॥ पद पदार्थ नियतं- जो अनादि काल से आदत बन गई होकर्म – कर्म योगत्वं – तुम कुरु – कर रहे हो हि  – क्योंकिकर्म – कर्म योगज्याय: … Read more

३.७ – यस् त्विन्द्रियाणि मनसा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक ६ श्लोक यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेSर्जुन ।कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ पद पदार्थ अर्जुन – हे अर्जुन!य : तु – वह व्यक्तिमनसा – मन के साथ (जो आत्मा पर केंद्रित है)इन्द्रियाणि – इंद्रियों  को नियम्य   – उन्हें शास्त्र द्वारा निर्मित कर्मों में … Read more

३.६ – कर्मेन्द्रियाणि संयम्य

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक ५ श्लोक कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ पद पदार्थ यः – जो ज्ञान योग पर ध्यान केंद्रित होकर्मेन्द्रियाणि – कर्मेन्द्रियाँ  जैसे  मुँह, वाणी, हाथ, पैर आदिसंयम्य – उन्हें अच्छी तरह से नियंत्रित करना (ताकि … Read more

श्री भगवद्गीता का सारतत्त्व – संक्षेप विषय

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री भगवद्गीता का सारतत्त्व सर्वेश्वर, श्रिय:पति, श्रीमन नारायण ने भूमि का बोझ कम करने के लिए श्री कृष्ण का अवतार लिया | भूमि के बोझ को मिटाने के परिश्रम में उनका सबसे मुख्य कार्य था महाभारत युद्ध संचालन करना | इस युद्ध को कृष्ण परमात्मा स्वयं … Read more

३.५ – न हि कश्चित् क्षणम् अपि

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक ४ श्लोक न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ पद पदार्थ हि – क्योंकिकश्चित्  – कोई भीजातु – सदैवक्षणं अपि – एक क्षण के लिए भीअकर्मकृत – बिना कर्म कियेन तिष्ठति  – नहीं रह सकता;सर्व:- हर कोई … Read more

३.४ – न कर्मणाम् अनारम्भान्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक ३ श्लोक न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं  पुरुषोSश्नुते ।न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ पद पदार्थ पुरुष :- कोई भी मनुष्य (जो इस संसार में  है)कर्मणां अनारम्भान् – कर्म योग शुरू करने के लगाव न होने के कारण नैष्कर्म्यम् – ज्ञान योगन अश्नुते – प्राप्त … Read more

३.३ – लोकेSस्मिन् द्विविधा निष्ठा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक २ श्लोक श्री भगवान् उवाचलोकेSस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ पद पदार्थ श्री भगवान् उवाच – श्री भगवान बोले अनघा! – हे निर्दोष !अस्मिन लोकेन – इस दुनिया में जो विभिन्न प्रकृति के लोगों से भरी हुई … Read more

३.२ – व्यामिश्रेणेव वाक्येन

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ३ << अध्याय ३ श्लोक १ श्लोक व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं  मोहयसीव मे ।तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम् ॥  पद पदार्थ व्यामिश्रेण – विरुद्ध वाक्येन इव – वचन मे –  मेरा अपनाबुद्धिं  – बुद्धिमोहयसी  इव – ऐसा प्रतीत होता है कि तुम मुझे भ्रमित कर रहे हो तत्  – इसलिएयेन … Read more