५.१७ – तद्बुद्धय: तदात्मान:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक १६ श्लोक तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: |गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा: || पद पदार्थ तद्बुद्धय: – पहले बताये गए आत्मानुभूति में दृढ़ रूप से केंद्रित होतदात्मान: – उस आत्मानुभूति में मन को पूरी तरह से संलग्न करते हुएतन्निष्ठा: – दृढ़ रूप से अनुचरण करते हुएतत्परायणा: – … Read more

५.१६ – ज्ञानेन तु तदज्ञानं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक १५ श्लोक ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन: |तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् || पद पदार्थ येषां – उन जीवात्माओंआत्मन ज्ञानेन तु – स्वयं के बारे में ज्ञानतत् अज्ञानं – वो कर्म ( सद्गुण / दुर्गुण )नाशितं – विनाश होनातेषां – उनकोपरं तत् … Read more

५.१५ – नादत्ते कस्यचित् पापं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक १४ श्लोक नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं  विभुः ।अज्ञानेनावृतं  ज्ञानं  तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ पद पदार्थ विभु: – जीवात्मा जो कई स्थानों में व्याप्त हो सकता हैकस्यचित् पापं –  (उनके  पुत्र आदि के समान प्रिय) लोगों के पाप न एव आदत्ते … Read more

श्री भगवद्गीता का सारतत्व – अध्याय ३ (कर्म योग)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री भगवद्गीता – प्रस्तावना अध्याय २ गीतार्थ संग्रह के सातवे श्लोक में स्वामी आळवन्दार् , भगवद्गीता के तीसरे अध्याय की सार को दयापूर्वक समझाते हैं , ” तीसरे अध्याय में समझाया गया है कि लोगों ( जिनको ज्ञान योग पालन करने की योग्यता नहीं है ) … Read more

५.१४ – न कर्तृत्वं न कर्माणि

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक १३ श्लोक न कर्तृत्वं  न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।न  कर्मफलसंयोगं  स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ पद पदार्थ प्रभु: – जीवात्मा जो वास्तविक स्वरूप में कर्म से बंधा नहीं हैलोकस्य – लोगों के विविध संग्रह के लिए [इस दुनिया में]कर्तृत्वं न सृजति … Read more

५.१३ – सर्वकर्माणि मनसा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक १२ श्लोक सर्वकर्माणि मनसा सन्यस्यास्ते सुखं  वशी ।नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन् न कारयन् ॥ पद पदार्थ देही – अवतरितवशी – आत्मा जो (स्वाभाविक रूप से) अपने नियंत्रण में हैनव द्वारे – शरीर के नौ द्वार वाले शहर मेंसर्व कर्माणि … Read more

५.१२ – युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक ११ श्लोक युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ पद पदार्थ युक्तः – जो अन्य मामलों में इच्छा के बिना आत्मा पर ध्यान केंद्रित हैकर्म फलं – कर्मों का परिणाम जैसे स्वर्गलोक पहुँचना आदित्यक्त्वा – त्याग … Read more

श्री भगवद्गीता का सारतत्त्व – अध्याय २ (सांख्य योग)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री भगवद्गीता का सारतत्त्व << अध्याय १ गीतार्थ संग्रह के छठे श्लोक में, आळवन्दार दूसरे अध्याय का सारांश समझाते हुए कहते हैं,  “शाश्वत आत्मा, वैराग्य के साथ धर्मानुकूल कर्म, स्थितप्रज्ञता की अवस्था (निर्णय और ज्ञान में दृढ़) के लक्षण, आत्मज्ञान और कर्मयोग का ज्ञान जैसे विषय … Read more

५.११ – कायेन मनसा बुद्ध्या

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक १० श्लोक कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ पद पदार्थ योगिन: – कर्म योगीसङ्गं – स्वर्ग आदि के प्रति लगावत्यक्त्वा – त्याग करकेआत्म शुद्धये – आत्मा से प्राचीन कर्मों (पुण्य / पाप ) से छुटकारा पाने और … Read more

५.१० – ब्रह्मण्याधाय कर्माणि

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय ५ << अध्याय ५ श्लोक ८ और ९ श्लोक ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं  त्यक्त्वा करोति यः।लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ पद पदार्थ यः- जो एकब्रह्मणि – इन्द्रियों जो महान प्रकृति  का प्रभाव हैंकर्माणि – देखने जैसे कर्म (जो स्वयं करता है )आधाय – (जैसा कि … Read more