श्री भगवद्गीता का सारतत्व – अध्याय १२ (भक्ति योग)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री भगवद्गीता – प्रस्तावना << अध्याय ११ गीता संग्रह के सोलहवें श्लोक में आळवन्दार स्वामीजी बारहवें अध्याय का सारांश समझाते हुए कहते हैं, “बारहवें अध्याय में, आत्म उपासना (स्वयं की आत्मा की खोज में संलग्न) की तुलना में भगवान के प्रति भक्ति योग की महानता, ऐसी … Read more

१३.१९ – प्रकृतिं पुरुषं चैव

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १३ << अध्याय १३ श्लोक १८ श्लोक प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्।। पद पदार्थ प्रकृतिं च – मूल प्रकृतिपुरुषं अपि उभौ एव – और जीवात्मा दोनोंअनादि विद्धि – जानो कि दोनों अनादि काल से एक साथ हैंविकारान् च – परिवर्तन (जैसे कि … Read more

श्री भगवद्गीता का सारतत्व – अध्याय ११ (विश्वरूप दर्शन योग)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री भगवद्गीता – प्रस्तावना << अध्याय १० गीतार्थ संग्रह के पन्द्रहवें श्लोक में, आळवन्दार ग्यारहवें अध्याय का सारांश समझाते हुए कहते हैं, “ग्यारहवें अध्याय में, यह कहा गया है कि भगवान को वास्तव में देखने के लिए दिव्य आँखें (कृष्ण द्वारा अर्जुन को) दी गई थीं। … Read more

१३.१८ – इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १३ << अध्याय १३ श्लोक १७ श्लोक इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते।। पद पदार्थ इति – इस प्रकारक्षेत्रं – शरीर जिसे क्षेत्र के नाम से जाना जाता हैतथा ज्ञानं – आत्मा के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के साधनज्ञेयं – आत्मा … Read more

१३.१७ – ज्योतिषाम् अपि तत् ज्योति:

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १३ << अध्याय १३ श्लोक १६ श्लोक ज्योतिषाम् अपि तज्ज्योति: तमस: परमुच्यते |ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्य हृदि  सर्वस्य विष्ठितम् || पद पदार्थ तत् – वह आत्माज्योतिषाम् अपि – चमकदार वस्तुओं (जैसे दीपक, सूर्य) के लिएज्योति: – प्रकाश है (उन्हें पहचानने के लिए);तमस: -आदि पदार्थपरं – से … Read more

१३.१६ – अविभक्तं च भूतेषु

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १३ << अध्याय १३ श्लोक १५ श्लोक अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् |भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं  ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च || पद पदार्थ तत् – वह आत्माभूतेषु च – (यद्यपि उपस्थित) सभी शरीरों में (जैसे देव ,मनुष्य, तिर्यक (पशु), स्थावर (पौधा)अविभक्तं – अविभाजित रहता है; (फिर … Read more

१३.१५ – बहि: अन्त: च भूतानाम्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १३ << अध्याय १३ श्लोक १४ श्लोक बहिरन्तश्च भूतानाम् अचरं चरमेव च |सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्  || पद पदार्थ भूतानां बहि: अन्त: च – [आत्मा] भूमि से शुरू होने वाले पाँच महान तत्वों के अंदर और बाहर दोनों जगहों में उपस्थित हैअचरं चरम् एव … Read more

१३.१४ – सर्वेन्द्रियगुणाभासं

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १३ << अध्याय १३ श्लोक १३ श्लोक सर्वेन्द्रियगुणाभासं  सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || पद पदार्थ सर्वेन्द्रिय गुणभासं – यह (आत्मा)इंद्रियों के कार्यों के द्वारा सभी विषयों को जानने में सक्षम हैसर्वेन्द्रिय विवर्जितम् – (अपनी प्राकृतिक अवस्था में) यह इंद्रियों के बिना भी सब … Read more

१३.१३ – सर्वत: पाणिपादं तत्

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १३ << अध्याय १३ श्लोक १२ श्लोक सर्वत: पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् |सर्वतश्श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य  तिष्ठति || पद पदार्थ तत् – वह शुद्ध आत्मासर्वत: पाणिपादं – हाथों और पैरों की सभी गतिविधियाँ कर सकता हैसर्वतोऽक्षि शिरो मुखम् – आँखों, सिर और चेहरे की सभी गतिविधियाँ कर सकता … Read more

१३.१२ – ज्ञेयं यत् तत् प्रवक्ष्यामि

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः अध्याय १३ << अध्याय १३ श्लोक ११ श्लोक ज्ञेयं यत् तत् प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते |अनादि मत्परं  ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || पद पदार्थ यत् ज्ञात्वा – जिसे जानकरअमृतम् अश्नुते – (आत्मा की) अविनाशी अवस्था प्राप्त होती हैयत् तत् ज्ञेयं – जानने योग्य ऐसे आत्मा के बारे मेंप्रवक्ष्यामि – … Read more